
सब की बाते सुनती हु अपनों की नाराजगी सह रही हु कभी कुछ नहीं कहा मैंने सब कुछ अकेले ही सहा, हाँ मैं स्पिक एशिया हूँ जो आज अपना दर्द बयान करना चाहती हु किसी बच्चे के कान्वेंट स्कुल की फ़ीस थी कभी मैं ,किसी बेटे के अपने माता पिता के प्रति सेवा का अरमान थी मैं किसी गरीब के होठों की मुस्कान थी मैं , 20 लाख लोगो की मां थी कभी मैं पर आज ............
आज मैं अपने उन्ही बच्चो का दुःख अपनी आँखों से देखने को मजबूर हु अपने ही बच्चो की नाराजगी झेलने को मजबूर हु और आज ये आलम है की मेरे अपने ही मुझ पर शक कर रहे है मुझ पर इल्जाम लगा रहे है और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही हु मैंने तो आपका ही सहारा बनना चाहा पर आपके ही कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते है पर फिर भी आपकी नजरो में मैं ही गलत होती जा रही हु क्या गलती की मैंने जो आपकी झोपडी की जगह महल बनाने की कोशिश की क्या गलती की मैंने जो आपके बच्चो को अच्छी तालीम देने की कोशिश की आपको पैदल चलने की जगह गाड़ी देने की कोशिश की,
आपको भी उन अमीरों की तरह कपडे पहनाने उनकी तरह अच्छा खाना खाने उनकी तरह अच्छा जीवन देने की कोशिश की क्या गलती की मैंने पर ठीक है आप कहते है मैं गलत हु तो गलत ही सही आप माने या ना माने आप मेरे अपने ही है और आपकी नाराजगी से मैं बिलकुल नाराज नहीं हु अपनों से नाराज होना मुझे नहीं आता मैंने जो सपना आप के लिए देखा है उसे मैं जरुर पूरा करुँगी इसके लिए चाहे मुझे कितना भी लड़ना पड़े संघर्ष करना पड़े मैं लडूंगी मैं संघर्ष करुँगी खुद को माँ कहा है तो माँ का फर्ज भी मैं निभाउंगी.......
आपकी अपनी
स्पिक एशिया
लेख
अनिल कालवानी
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